Saturday , June 15 2024

संकीर्णताओं को तोड़ो

सूफी का अर्थ होता है-जो स्वच्छ हो गया, जिसके मन का सारा मैल धुलगया-वह सूफी। फिर तुम्हारी जो मौज हो, नाम दे लेना। नाम से कुछफर्क नहीं पड़ता। कब तक बच्चों जैसे उलझे रहोगे-माटी के खिलौनों से!माटी के खिलौनों से बहल जाते हैं लोग!
जागो। थोड़ा देखो विस्तार । संकीर्णताओं को रोज-रोज तोड़ते चलो।
कितनी ही पीड़ा हो, मगर संकीर्णताएँ तोड़न तभी तुम जान सकोगे
जीवन का परम सत्य। उसे जाने बिना कोई मुक्ति नहीं है, कोई मोक्ष नहींहै।सुना है कि एक पैगम्बर इस्माईल अलैहिस्सलाम भोजन करते समयकिसी-न-किसी को अपने साथ बिठाकर भोजन करवाते थे। कभी अकेलेनहीं खाते थे। एक दिन वे खाना खाने बैठे। दस्तरख्वान सजाया। लेकिनसाथ खाने के लिए कोई न था। इन्तजार करते रहे। और तभी उनकी नजरएक सत्तर वर्ष के बूढ़े पर पड़ी। खुशी से दौड़े। उसे बुलाया। वजू करवाया।वजू करके जब खाना खाने बैठे, तो उस बूढ़े ने बिस्मिल्लाह कहे बिना ही
खाना शुरू कर दिया।इन पैगम्बर ने उसके हाथ को रोक दिया मुँह में जाने के पहले ही।कहने लगे, “बिस्मिल्लाह कहे बिना खाना नहीं खाने दूंगा। अल्लाह का नामलेकर शुरू करो।”लेकिन उस बूढ़े ने इंकार कर दिया बिस्मिल्लाह करने से। वह बोला,
“मैं तो आतिश-परस्त, अग्नि-पूजक पारसी हूँ। मैं नहीं मानता इस्लाम को।इसलिए आप चाहें, तो खिलाएँ या न खिलाएँ। मैं बिस्मिल्लाह नहीं बोलूंगा!”तभी आकाश से एक आयत (गद्य) नाजिल हुई–’ऐ पैगम्बर, इसआदमी को हम सत्तर वर्ष से खाना दे रहे हैं। हमने इसे कभी नही कि हमारा नाम लो। न कभी इसने बिस्मिल्लाह किया। फिर तुम क्यों इसकोखाने से रोक रहे हो? सिर्फ एक दिन खिलाने में भी तुम शर्त लगा रहेहो।”यह आवाज सुनी, तो पैगम्बर रोने लगे और उस व्यक्ति से बोले,”मुझे क्षमा कर दो और खाना खाओ।”
धर्म की कोई शर्त नहीं, कोई सीमा नहीं । राम कहो, रहीम कहो, अल्लाहकहो, ओंकार कहो; कुछ न कहना हो, कुछ न कहो-मौन रहो। अग्नि कोपूजो यह भी उसका प्रतीक है। जल को पूजो वह भी उसका प्रतीक है।सब उसके प्रतीक हैं, क्योंकि वही है और तो कुछ भी नहीं है।
ओशो संकलन कर्ता राम नरेश यादव
राष्ट्रीय अध्यक्ष
दिव्य जीवन जागृति मिशन इटावा
उत्तर प्रदेश
मोबाइल नंबर8218141639