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जहां एक मन है वहां जीवन का सब कुछ है शांत भी है सुख भी है आनंद भी है और जहां एक मन है वहां सब कुछ है

जहां एक मन है वहां जीवन का सब कुछ है शांत भी है सुख भी है आनंद भी है और जहां एक मन है वहां सब कुछ हैऔर जहां एक मन है, वहां जीवन का सब कुछ है-शांति भी,
सुख भी, आनंद भी। जहां एक मन है, वहां सब कुछ है-शक्ति
भी, संगीत भी, सौंदर्य भी। जहां एक मन है, उस एक मन के पीछे
जीवन में जो भी है, वह सब चला आता है। और जहां अनेक मन
हैं, तो पास में भी जो है, वह भी सव बिखर जाता है और खो जाता
है। लेकिन हम सब पारे की तरह हैं-खंड-खंड, टूटे हुए, बिखरे
हुए। खुद ही इतने खंडों में टूटे हैं, कि कैसे शांति हो सकती है!
जोसुआ लिएवमेन ने अपने संस्मरण लिखे हैं। संस्मरण की
किताब को जो नाम दिया है, वह बहुत अच्छा है। और किताब के
पहले ही हिस्से में उसने जो उल्लेख किया है, वह कीमती है। कहा
कि जवान था, विश्वविद्यालय से पढ़कर लौटा था, तो मेरे मन में
हुआ कि अब जीवन का एक नक्शा बना लूं कि जीवन में क्या-क्या
पाना है! स्वभावतः, जीवन का एक नक्शा हो, तो जीवन को
सुव्यवस्थित चलाया जा सके।
तो उसने एक फेहरिस्त बनाई। उस फेहरिस्त में लिखा कि धन
चाहिए, सुंदर पत्नी चाहिए, यश चाहिए, सम्मान चाहिए, सदाचार बनाना है।
चाहिए…। कोई बीस-बाइस बातों की फेहरिस्त तैयार की। उसमें
जो आदमी चाह सकता है। जो भी चाह चाह सकती
सब आ गया,है, वह सब आ गया। जो भी विषय की मांग हो सकती है, वह सबआ गया। जो भी कामना निर्मित कर सकती है, वे सब सपने आगए। पर न मालूम, पूरी फेहरिस्त को बार-बार पढ़ता है, कि इसमें
और कुछ तो नहीं जोड़ा जाना है; क्योंकि वह जीवनभर का नक्शा
सब खोज लेता है, कुछ जोड़ने को बचता नहीं। सब आ गया,
फिर भी, समथिंग इज़ मिसिंग। कुछ ऐसा लगता है कि कोई कड़ी
खो रही है। क्यों लगता है ऐसा? क्योंकि रात सोते वक्त उसने
सोचा कि मैं देखू कि सब मुझे समझ लो कि मिल गया, जो-जो
मैंने फेहरिस्त पर लिखा है, सब मिल गया हो जाएगा सब ठीक?
तो मन खाली-खाली लगता है। मन में ऐसा उत्तर नहीं आता
आश्वासन से भरा, निश्चय से भरा, कि हां, यह सब मिल जाए,
जो फेहरिस्त पर लिखा है, तो बस, सब मिल जाएगा। नहीं, ऐसा
निश्चय नहीं आता; ऐसी निश्चयात्मक लहर नहीं आती भीतर।
तो गांव में एक बूढ़े फकीर के पास वह गया। उसने कहा कि
इस गांव में सबसे ज्यादा बूढ़े तुम हो, सबसे ज्यादा जिंदगी तुमने
देखी है। और तुमने जिंदगी गृहस्थ की ही नहीं देखी, संन्यासी की
भी देखी है। तुमसे बड़ा अनुभवी कोई भी नहीं है। तो मैं यह
फेहरिस्त लाया हूं, जरा इसमें कुछ जोड़ना हो तो बता दो
उस बूढ़े ने पूरी फेहरिस्त पढ़ी, फिर वह हंसा और उसने कलम
उठाकर वह पूरी फेहरिस्त काट दी। और पूरी फेहरिस्त के ऊपर
बड़े-बड़े अक्षरों में तीन शब्द लिख दिए, पीस आफ माइंड, मन
की शांति। उसने कहा, बाकी ये सब तुम फिक्र छोड़ो; तुम यह एक
चीज पा लो, तो यह बाकी सब मिल सकता है। और यदि तुमने
बाकी सब भी पा लिया, तो भी ये जो तीन शब्द मैंने लिखे, ये तुम्हें
कभी मिलने वाले नहीं हैं। और आखिर में निर्णय यही होगा कि यह
पीस आफ माइंड, यह मन की शांति मिली या नहीं!
तो लिएबमेन ने अपनी आत्मकथा लिखी है, उसको नाम दिया
है, पीस आफ माइंड। किताब को नाम दिया, मन की शांति। और
लिखा कि उस दिन तो मुझे लगा कि यह बूढ़े ने सब फेहरिस्त खराब
कर दी। कितनी मेहनत से बनाकर लाया हूं और इस आदमी ने सब
काट-पीट कर दिया। जंची नहीं बात कुछ उसकी। लेकिन जिंदगी
के अंत में लिएबमेन कहता है कि आज मैं जानता हूं कि उस बूढ़े
ने फेहरिस्त काटी थी, तो ठीक ही किया था। उसने फाड़कर क्यों न

फेंक दी! बेकार। आज जीवन के अंत में वे ही तीन शब्द पास घूम
रहे हैं। काश, उस दिन मैं समझ जाता कि मन की शांति ही सब
कुछ है, तो शायद आज तक पाया भी जा सकता था। लेकिन
जिंदगी उसी फेहरिस्त को परा करने में बीत जाती है सबकी।
ओशो
गीता दर्शन